*चाँद ज़मीं पर*

जब रात को मैं सो जाती हूं,
तो चाँद ज़मीं पर आता है
मेरे आंगन में खूब सारी,
वो चाँदनी छोड़ के जाता है
सुबह को जब मैं उठती हूं,
उस चाँदनी से मुंह धो लेती हूं
फ़िर चाँद के जैसे ही,
मेरा मुख भी चमचम करता है।
______✍️गीता

Comments

6 responses to “*चाँद ज़मीं पर*”

  1. Satish Pandey

    कवि गीता जी की यह एक सुरम्य रचना है, जिसमें सौंदर्य का भावबोध है। भारतीय जीवन में चाँद सर्वाधिक आकर्षित और प्रभावित करने वाले कारकों में से एक है। यह अद्भुत परिकल्पना से रची गई कविता है। प्रतीकात्मकता का चरम उत्कर्ष है। बिम्ब बनाती उत्कृष्ट रचना है।

  2. Geeta kumari

    मेरी छोटी सी रचना की इतनी सुरम्य समालोचना की है सर आपने कि धन्यवाद करने को शब्द ही कम पड़ रहे हैं। इस कलित समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी, बहुत-बहुत आभार

  3. बहुत खूब, सुन्दर रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी

  4. अतिसुंदर रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏

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