चाय हटा लो

कविता- चाय हटा लो
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माफी देकर,
गले लगा लो,
दुख होता हैं,
होठ से अपने,
चाय हटा लो|
जो हक मेरा हैं,
कुल्हड़ क्यूं छीन रहा,
देख देख रोते हैं,
कुल्हड़ मन माना,
होठों से चिपक रहा|
मत बे दर्द बनों,
हें मिट्टी के बर्तन,
तरस खाओ हम पर भी,
हम भी मिट्टी के बर्तन|
हममें तुममें
अन्तर इतना,
हमसे जलकर दूर रहें,
तुमसे जलकर पास रहें,
कह देना,
होठ से उसके,
हक मेरा नहीं,
उसका हैं|
छोड़ दो मुझको,
अपना लो उसको,
पल भर के लिए ,
हम साथ तुम्हारे,
अपना लो उसको,
कई जन्म का रिश्ता होगा |
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’

Comments

7 responses to “चाय हटा लो”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुंदर

  2. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब

  3. अति सुंदर रचना
    यह कविता पढ़कर मन भर आया

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