आंखों में शर्म
पलकों में हया
लब पर मोहब्बत
की दास्तां है
आपके दिल से
शुरू मेरा सफर
आपकी बाहों में ही
खत्म मेरा रास्ता है
जी ना पाएंगे हम
आपके सांसो के बिना
आपकी चाहत भरी हंसी
भी अब जरूरी है
आते हैं आप तो
रोज ही मेरे ख्यालों में
हकीकत में नहीं आते
क्यों कौन सी मजबूरी है।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज
चाहत
Comments
2 responses to “चाहत”
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बेहतरीन
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👌👌👌👏👏👏👏
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