Virendra sen's Posts

नए साल ने दस्तक दी है

नए साल ने दस्तक दी है आओ इसको हग कर लें । मन तन वचन ध्यान से अपना सारा जग कर ले। बीत गया सो बीत गया कुछ सीख गए कुछ सिखा गया । कल का नहीं पता क्या हो अपनों की कुछ दूरी मिटा गया। माना कि बहुत सताया सबको कल गया साल जो बीत गया। पर हमने भी कुछ छीना उसका वह तभी तो बाजी जीत गया। धरती पर नहीं है हक केवल इंसानों का सीख दे गया ये जाने वाला साल । अपने पराए की पहचान हो गई खोखला साबित हो गया संबंधों का जाल। अद... »

सावधान

अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित करने आए हैं हम नौजवान देख रहा नतमस्तक होकर अपनी  दिलेरी आसमान भारत के लाडलें हम मातृभूमि पर प्राण चढ़ाएं तन मन धन से हम सब जग जननी का मान बढ़ाएं कण-कण मिलकर एक हुआ और बन गया तूफान इस मिट्टी के कर्जदार हैं बहुत है हम पर एहसान अपने वतन से किसी को भी अब करने नहीं देगें गद्दारी आत्म समर्पण कर दो तुम हो जाओ फिर सावधान। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

प्यार के धागे

प्यार के धागों से रिश्तो को सिल रहा हूं बड़ा हूं फिर भी झुक कर मिल रहा हूं सुना है प्यार में ताकत बहुत होती है हर बिगड़े काम आसान बना देती है उम्मीद है, आज भी सब से मिल रहा हूं प्यार के धागों से रिश्तो को सिल रहा हूं। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

सोच

चाहोगे जीतना तभी जीत पाओगे मानोगे अपने हैं तभी अपनाओगे लोभ और ईर्ष्या के दलदल से जब तक निकलने की सोच ना होगी मन के रावण को तुम कैसे जला पाओगे। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

माटी की मूरत

माटी की मूरत होते हैं बच्चे जैसा बनाओगे वैसे बन जाएंगे चाहो तो उनको गांधी बना दो जो सत्य की राह का पथिक बनेगा चाहो तो उसको भगत सिंह बुलाओ वो देश की खातिर मर मर मिटेगा चाहो तो उसको ध्रुव नाम दो चमकेगा आसमां में सितारा बनके नेहरू बनेगा तिलक भी बनेगा देश की तन मन से सेवा करेगा झांसी की रानी भी उनको बनाओ वह मैदान से पीछे कभी ना हटेगी संस्कारों भरा अगर होगा बचपन जवानी की दहलीज पर न बहकेंगे कदम मां-बाप ... »

उम्मीद

यह जो नाजुक सा दौर है आहिस्ता आहिस्ता खत्म हो जाएगा बस उम्मीदों का दीपक तुम यूं ही आगे भी जलाए रखना। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

इम्तहान

भोग विलास के लिबास पहनकर कब तक खुद से प्यार करोगे काम क्रोध ईर्ष्या को त्यागो जीवन का भव पार करोगे माया मोह के इम्तहान में जब तक सफल ना होगे तुम लोगों के दिल में बस न सकोगे खुद की नजर से रहोगे गुम जब तक जीवन की गाथा का कोई सार नहीं मिल जाता है तब तक प्यार के सागर में कोई गोता कैसे लगाता है। जन्म मरण अच्छा बुरा ये सब जीवन की रचना है हमको तो बस इम्तिहान में इन सभी से ही तो बचना है। वीरेंद्र सेन प्रय... »

खता

लम्हों ने खता की है सजा हमको मिल रही है ये मौसम की बेरुखी है खिजां हमको मिल रही है सोचा था लौटकर फिर ना आएंगे तेरे दर पर बैठे हैं तेरी महफिल में खुद से ही हार कर कह लेते हाले दिल क्यों ये जुबां सिल रही है ये मौसम की बेरुखी है खिजां हमको मिल रही है लम्हों ने खता की है सजा हमको मिल रही है हम भी तो मानते हैं दिल के महल का राजा जाने से पहले दिलबर एक बार फिर से आजा मुरझा चुकी कली भी फिर आज खिल रही है य... »

पर्यावरण

पर्यावरण के असंतुलन की तस्वीर हर ओर दिखने लगी है जिंदगी जीने की एक नई परिभाषा चहुं ओर लिखने लगी है विकट गर्मी का परिणाम दिख रहा है सूख रहे तालाब पेड़ कट कट बिक रहा है धरा की हरियाली से खिलवाड़ बंद करो भविष्य का सुकून चाहिए तो अब वार बंद करो पक्षियों का झुंड भी उड़ चला है अब तो हरियाली छांव की तलाश में प्यासे पशु पक्षी, व्याकुल गरीब मर रहा है अब तो पानी के प्यास में कल के भविष्य को बचाना है अगर जीव... »

कितना अच्छा होता

कितना अच्छा होता हर हिंदू मुस्लिम बन जाता हर मुस्लिम हिंदू बन जाता हर घर में अल्लाह आ जाते हर घर में आ जाते राम कितना अच्छा होता हर गरीब अमीर बन जाता हर अमीर बन जाता सज्जन हर आंखों में सपने सजने हर आंगन में खिलते फूल कितना अच्छा होता ना कहीं भी दंगा होता ना किसी से पंगा होता हर कोई होता अपना भाई हर तरफ बजती शहनाई कितना अच्छा होता हर हिंदू मुस्लिम बन जाता हर मुस्लिम हिंदू बन जाता हर घर में अल्लाह आ... »

तुम कब बाहर घर से

निकलूं कब बाहर मैं घर से हरदम बैठा रहता मौसम के डर से एक साल में बारह महीने चार महीने गिरे पसीने फिर सोचूं मैं निकलूं बनके तब होती बरसात जमके आठ महीने यूं ही गुजरे फिर आए जाड़े की करवट बाहर निकले कांपे थरथर तुम ही बताओ बारह महीने ऐसे ही मौसम के डर से निकलूं कब बाहर में घर से। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

बाट

राधा ने सिर पर धर मटकी बैठी छांव तले वट की जोह रही है श्याम को अखियां दिन बीता अब बीती रतियां श्याम बिना निष्प्राण है गैया देख रही सुध खोकर मैया क्यों निष्ठुर तू बना कन्हाई क्या तनिक भी मेरी याद न आई।        वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

ओस के मोती जड़े हैं

फूलों ने पंखुड़ियों का हार बना कर पहना है प्रकृति की हरियाली का आज यही बस कहना है परियों के गहनों में सोने के बूटे पड़े हैं हम पत्तों के हारों में ओस मोती जड़ें हैं वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

परिणीता

प्रिय की प्रियतमा बनकर आनंदमय जीवन का सूत्रधार बनो अशोविता हो एक सशक्त जीवन एक ऐसा ही तुम सार बनो संलग्न कर जीवन तुम अपना करो पथिक का पूरा सपना जीवन जिसका तुम संग बीता बनी रहो उसकी परिणीता। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

चाहत

आंखों में शर्म पलकों में हया लब पर मोहब्बत की दास्तां है आपके दिल से शुरू मेरा सफर आपकी बाहों में ही खत्म मेरा रास्ता है जी ना पाएंगे हम आपके सांसो के बिना आपकी चाहत भरी हंसी भी अब जरूरी है आते हैं आप तो रोज ही मेरे ख्यालों में हकीकत में नहीं आते क्यों कौन सी मजबूरी है। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

रानी बिटिया

मम्मी की मैं रानी बिटिया पापा कहते सयानी बिटिया धमा चौकड़ी भागम – भाग कूद – कूद कर करती बात कहती मम्मी कहो कहानी जिसमें हो राजा और रानी हाथी घोड़ा शेर भी हो और हो उसमें नाना नानी इधर से जाती है उधर से आती कभी हंसाती कभी रुलाती दिन भर करती शैतानी बिटिया मम्मी की मैं रानी बिटिया पापा कहते सयानी बिटिया। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

बेतार का तार

बेतार का तार भी क्या अजब खेल दिखाता है किसी हेलो पर चेहरा खिलखिलाता है तो किसी हेलो पर मुरझा जाता है हर एक कॉल की अलग कहानी है किसी में घुटन भरी छटपटाहट किसी में झरनों से बहता पानी है बिना तार के किसी के साथ जीवन का संबंध बना देता है किसी हारे हुए इंसान को जीने की वजह देता है सबके जीवन में रस घुले ऐसी ही चाह हर राह मे होती है मगर दुख की घड़ी भी जरूरी है वही जीवन का सच्चा पाठ पढ़ाती है अपने परायों ... »

मेरा विचार

न ही मंदिर का न मस्जिद का इस दुनिया को इंतजार है गरीबों के लिए बने शिक्षा का आलय यह मेरा अपना विचार है। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

डर

बहक ना जाएं कहीं कदम हमारे डरते हैं इसी बात से हम क्योंकि गुजरते हैं हर रोज हम भी मैखानें के करीब से। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

तेरा जवाब

ऐ खूबसूरत बहारों की मलिका कहां से लाऊं ढूंढ कर तेरा जवाब आसमां में चमकता है जो चांद लगा है उसमें भी दाग। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

विरासत

जब मां की कोख में मेरी जिंदगी पल रही थी मेरे बाप की चिता भी श्मशान में जल रही थी जब हमने इस दुनिया में अपनी आंखें खोली देखी खून की होली सुनी बंदूकों की गोली चारों तरफ बनता गया बस मौत का ही नक्शा सुहागन तो सुहागन विधवा को भी ना बक्शा मैंने जब धरती पर कदम रखकर चलना सीखा बदले की आग में साथ ही हमने जलना सीखा उठा ली बंदूक हमने किया मौत को हिरासत क्योंकि मेरे अपनो से मिली थी यह दौलत हमें विरासत। वीरेंद्... »

माता-पिता

मेरे हर प्रश्न का जवाब है मां मेरे हर दर्द का इलाज है मां भीड़ में भी जो पहचान लेती है अपने बच्चों की हर एक आहट ऐसी अनपढ़ी, अनलिखी एक किताब है मां मेरे हर प्रश्न का जवाब है मां मेरे पापा सबसे अच्छे प्रणाम करते हम सब बच्चे बाहर से सख्त भले ही हो मगर अंदर से नरम होते हैं जो हार को जीत में बदलने की सीख देते हैं हौसला बढ़ाते हैं, मार्गदर्शक बन आगे आते हैं वही तो सचमुच में पिता कहलाते हैं जब जब दुनिया ... »

तिलक

विजय श्री का तिलक तभी तो लगेगा जब बन के चट्टान अग्नि पथ पर चलेगा कमजोर खुद को समझना है भूल कीचड़ में भी तो खिलता है फूल प्रश्न चिन्ह की मुद्रा से तुम ना निहारो जीत का बिगुल बजा के ना हारो सरहद पर जब भी कोई लड़कर मरेगा विजय श्री का तिलक तभी तो लगेगा एहसास जीत का होता वही जो गिर गिर संभल के चलते रहे हैं हारे तो वह जो निकले नहीं पथरीले पथ से डरते रहे हैं रोशन उसी का नाम हुआ जो अपनी ही धुन में बढ़ता ग... »

भक्ति

ईश्वर की भक्ति में छिपा है जीवन का आनंद शब्दों को ताकत देता है जैसे अलंकार और छंद उसके बिना इस जीवन में कुछ भी नहीं अस्तित्व हमारा मां बाप भी एक रूप है उनके लाठी बन, बन जाओ सहारा विपरीत हवा का रुख रहा फिर भी बच्चों में ही मां का सुख रहा है धैर्य धरा पर अगर कहीं है वह ममता का आंचल है दुख सुख आशा और निराशा यह तो एक परीक्षा है फिर भी मन के कोने कोने मचा हुआ है द्वंद शब्दों को ताकत देता है जैसे अलंकार... »

पिया मिलन

नहीं भुलाई जाती वो पिया मिलन की रात उस रोज पहली बार की हमने आंखों से बात सुहाग सेज के फूलों ने जाने कैसा जादू किया बेचैन निगाहों में है बस उन्हीं का इंतजार जो आज हद चाहत की कर जाएंगे पार वह मेरे इतने करीब थे कि सांसे टकरा रही थी मेरी पलके झुकती बस झुकती ही जा रही थी सूरज की पहली किरण ने जब खिड़की से झांका तब हमने जाना गुजर चुके हैं जिंदगी के हसीन लम्हात नहीं बुलाई जाती वो पिया मिलन की रात उस रोज प... »

सरहद

सौ दफा मैं हारा बेशक जिद है फिर भी जीत की सरहद नहीं होती कोई परिंदों और प्रीत की। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

न दिखे

हमें मालूम होता अगर उनकी आदत है रूठ जाने की तो हम कभी परवाह ना करते इस जमाने की । तोड़कर दुनिया की सारी रस्में कसमें चले आते तेरे पहलू में दिल अपना रखने । अगर जिंदगी के सफर में आप मेरे संग होते तो इस तरह से मेरे ख्वाब ना बेरंग होते । उन्हें तलाशने में हम एक जिंदगी में सौ बार बिके घूंघट की आड़ से हर तरफ देखा उन्हें किसी ओर भी ना दिखे। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

जवां दर्द

तन्हाई के आलम में घुट-घुटकर जब दर्द जवां होता है चाहत में खिले फूलों का पत्थर पर निशां होता है । टूट कर बिखरने से पहले यूं बाहों में समेट लेते हैं जैसे धरती को समेटे सारा आसमां होता है। सच है कि दूर रहने से प्यार बढ़ता है चुप रहने की कसम खा कर भी राज ए इजहार बयां होता है। जवां दिल को तड़पने दूं या कुछ घड़ी आराम दे दूं सोचकर लम्हें मोहब्बत के वक्त पर गुमां होता है । नींद आती नहीं चैन भी खोया सा है ... »

महत्व

लड़की है तो क्या हुआ हम भी लिख पढ़ ले अगर दुनिया के दरवाजे खुलेंगे मिलेगी हमको भी डगर विद्या में है ताकत कितनी बात समझ में आ गई दुनिया के हर क्षेत्र में नारी आसमान सी छा गई पढ़ लिख कर हम उन्हें बताएं जो अब तक हैं अंधियारे में ज्ञान का दीप जला कर मन में अब आ जाओ उजियारे में खुद को समझो खुद को जानो कल कि शायद हस्ती हो तुम ना पढती ना लिखती तो दुनिया में रह जाती गुम खुल गई है आंखें अपनी पढ़ लिख कर हम ... »

जेड प्लस

सुंदर महिलाओं की सुरक्षा पर संसद में एक बिल पास हुआ पास होते ही बिल देश के कोने कोने में खास हुआ सरकार बोली सुंदर महिलाओं को जेड प्लस की सुरक्षा मिलनी चाहिए हर खूबसूरत कली सुरक्षित खिलनी चाहिए तभी विपक्ष से एक आवाज आई शादी के बाद क्या सुरक्षा श्रेणी रिवाइज की जाएगी मंत्री महोदय ने फरमाया, नहीं इस काम की जिम्मेदारी पति द्वारा निभाई जाएगी। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

इजाजत

आपकी आंखों में खोना चाहता हूं आपकी जुल्फों में सोना चाहता हूं । अर्जी डाल रखी है हमने भी इजाजत की मंजूरी मिल गई, तो आपका होना चाहता हूं। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

पहले प्यार का एहसास

प्रेम कहानी की शुरुआत जब हुई किस्तों में सही पर बात दिन रात हुई आंखों की नींद जाने कहां गुम हो गई अपनी भी खबर नहीं जब पास वह हुई। बिस्तर पर करवटें बदलते ही रहते हैं अनचाही से राह पर चलते ही रहते हैं अपनों से दुश्मनी भी अच्छी लगती है दिल के किसी कोने में वह खास जब हुई । वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

पूर्ण विराम

इंसानियत कब इंसान की जिंदा होगी क्या तब जब हर आत्मा से निंदा होगी जागो देखो सोचो सुलग रहा है समाज कब तक बंद रखोगे अपनी आवाज बोलो जो चाहते हो, कहो जो सोचते हो किसी का इंतजार अब नहीं समाज गूंगा है, बहरा है खुद अपनी सुनो वही करो जो बेहतर है काट दो हर उस जड़ को जो दीमक बनकर खोखला कर रही है मर्यादाओं को बदलो इन रिवाजों को जो सबके लिए नहीं है एक लंबी जीवन यात्रा बिना लक्ष्य कब तक हत्या बलात्कार भ्रष्टाच... »

पगडंडियां

पगडंडियां जिंदगी के सफर में बहुत कुछ सिखा जाती हैं। कभी नफरत के साए में जीना कभी प्यार का पाठ पढ़ा जाती हैं। जिंदगी की पगडंडियों पर चलते हुए उम्र के कई पड़ाव पार कर गए हैं । कभी खुशी कभी ग़म का दौर आया कभी रोए कभी मदद हाथ हजार कर गए हैं। पगडंडियों ने कभी राह बदलने का हुनर सीखने की ख्वाहिश नहीं की। ये तो हम हैं जो वक्त – वक्त पर बदल जाने की बात किया करते हैं। पगडंडियों पर कभी पत्थर तोड़ते लोग... »

मोहब्बत

ये पता है कि दुश्वारियां बहुत हैं मोहब्बत की पथरीली राहों में । न जाने फिर भी क्यों बेचैन रहता है दिल सिमटने को किसी की बाहों में। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

सतर्क भारत समृद्ध भारत

मुसीबत के दौर में सतर्कता ही हर संकट का हल होगा । सतर्कता का लिबास पहन लो कल भविष्य तुम्हारा उज्जवल होगा । समृद्ध भारत के राह का उद्गम है, स्वच्छ, सतर्क और जोश भरे समाज से । बदल रही हैं फिजा देश की, युग बदलेगा विश्वास है, यह चल पड़ेंगे अपने अपनों की आवाज से। डिजिटल के इस दौर में हर काम बहुत आसान हुआ । विश्व में भारत का अब मजबूत बहुत ही नाम हुआ । अपडेट हो रहे बच्चे बूढ़े स्मार्ट हो गया है भारत अपना... »

दायरा

कुछ इस तरह से बढ़ता गया दायरा मोहब्बत का कि हम जान भी ना पाए कि दिल ने कब करवट बदल ली। »

हर कोना रोशन हो जमी का

हर घर से भाग रहा है बुराई का अंधेरा सोने वाले जाग गए हैं कल एक नया सवेरा मन की आंखों से निहारो हर बुराई में छिपी अच्छाई इसी सोच को सच करने फिर से लौट कर दिवाली आई कभी किसी का बुरा न सोचो कभी ना तोड़ो दिल किसी का जलो दिए की तरह अगर तुम हर कोना रोशन हो जमी का। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

उम्र प्यार की

इन सुर्ख अधरों को मेरे गालों तक मत लाना चाहत और बढ़ जाएगी प्यार की । अपनी जुल्फों को अब और मत लहराना रात लंबी हो जाएगी इंतजार की । तड़पते रहेंगे उम्र भर मगर जुबां से कुछ ना कहेंगे उनको भी तो खबर होगी दिल ए बेकरार की । तुम्हारी यादों को शब्दों में किस तरह ढालूं सुबह की धूप हो या कली अनार की । कभी सावन कभी भादो जैसी लगती हो तुम सच क्या है देखूं एक बार उम्र प्यार की। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

वर्तमान ही जिंदगी है

दुखी वही है जिसका वर्तमान खोया है कल जो बीत गया कल जो आने वाला है दो कल के अदृश्य महलों में मन विचरता रहता है मन कितना निष्ठुर है खुद देख लो, दो कल के बीच वर्तमान को देखने की इच्छा ही नहीं करता हम वर्तमान में जीते हैं हमारा मन तो कल के नाव में सवार है यही हमारे दुखों का कारण है आज को देखो कोशिश करो कि तुम्हारा मन आज को देखें हर जतन करो वर्तमान में मन का वास हो क्योंकि वर्तमान ही तन की खुशी है वर्त... »

हालात

आप चाहते तो हालात बदल सकते थे, आप के आंसू मेरी आंखो से निकल सकते थे । मगर आप तो ठहर गए झील के पानी की तरह, दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे। »

ऐ सनम

जब से देखा तुमको ऐ सनम, हमसे ही दिल हमारा नहीं जाए संभाला । रात आंखों में ही कट जाती है, लगता है नींद ने आंखों से रिश्ता ही तोड़ डाला। »

इश्क

तेरे इश्क का जुनून मेरे रग रग में बस गया है। ये एहसास मुझे अब हद से ज्यादा होने लगा है। »

गुल्लक

खुशियों की गुल्लक टूट गई जब अपनों से ही शूल मिला विश्वास करें भी तो कैसे जब कांटो में लिपटा फूल मिला। सगे-संबंधियों ने मुंह मोड़ा शायद कुछ हम मांग न ले कहीं मिले तो ऐसे मिलते जैसे हम पहचान न लें। वक्त बदला तो अपने बदले किस-किस को हम दर्द सुनाएं चुप रहने को मजबूर हुए शायद है किस्मत की सजाएं। सपनों का हर धागा है टूटा पर विश्वास है मंजिल पाएगें बुरा किसी का कभी किया ना तो लौटकर फिर दिन आएंगे वीरेंद्र... »

तुम्हारे बिना

आपके बिन अब तो गुजरते नहीं जिंदगी के एक भी पल रोज रातों को आपकी तस्वीर से पूछता हूं कि काटेंगे कैसे तुम्हारे बिना कल। »

मर्जी आपकी

मेरे सपनों का रास्ता गुजरता है आपकी जिंदगी से । मर्जी आपकी ठुकरा दे हमें या लगा ले गले खुशी से। »

पहली रात

पहली रात के मिलन का वो एहसास याद रखना । हवाएं भी चलेंगी थम-थम कर मौसम भी होगा खास याद रखना। »

ख्याब क्या होगा

तन्हाइयों से ही जिसने बात की है जिंदगी भर मेरे आने का उनको एहसास क्या होगा वीरानियां ही जिनका आशियाना हो उन्हें महलों का ख्वाब क्या होगा जिंदगी जिनकी एक सवाल बन चुकी है पास उनके मेरा जवाब क्या होगा जो देखकर आंखों में गम हकीकत बयां कर देते हैं उनके दिलों में छुपा राज क्या होगा। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

हिन्दी की बेबसी

अपने देश में अपनी भाषा बदनसीब हो गई आगे आओ युवा देश के हिंदी गरीब हो गई मातृभाषा है राष्ट्रभाषा है फिर क्यों तुम शर्माते हो प्रणाम छोड़कर गैरों से तुम हाय हेलो अपनाते हो मीरा तुलसी के देश की कैसी तहजीब हो गई आगे आओ युवा देश के हिंदी गरीब हो गई अंग्रेजी शासन से तो मुक्त हुए पर भाषा से मुक्ति कब मिल पाएगी अपने देश में अपनी भाषा कब तक यूं शर्माएगी आयोजन कर – कर खाते-पीते दिनकर और रसखान की हिंदी... »

बेटी

पापा के लिए तो परी हैं बेटियां हर दुख दर्द में संघ खड़ी है बेटियां फिर क्यों कहते हैं कि तू धन है पराया क्यों बेटी का कमरा भुला दिया जब घर बनाया बेटी नहीं तू बेटा है कहते हैं सब अपने फिर वक्त पर क्यों भुला दिए जाते हैं सपने बेटी कभी घर में हिस्सा नहीं लेती क्या इसीलिए वह घर का हिस्सा नहीं होती गूंजा था हर कोना बेटी की किलकारी में क्यों आज पराए हो गए हम रिश्तो की बलिहारी में। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

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