“चिरागों से उजाले”

अलग हो कर पानी से, कमल खिला नहीं करते
बिछड़ कर लोग किसी से मिला नहीं करते
यूँ तो आती है बाहर ज़िन्दगी में सबके मगर
बुझे हुए चिरागों से उजाले हुआ नहीं करते

देव कुमार

Comments

3 responses to ““चिरागों से उजाले””

  1. Dev Kumar Avatar
    Dev Kumar

    Thanku Janab

  2. Abhishek kumar

    Good

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