चीख

मेरी बेसुध, बेजान
पड़ी रूह
बेआबरू हुआ जिस्म
आज फना हो रहा है
जा रहा है अन्तरिक्ष की
वृहद सैर पर,
जीवन में कुछ लूटेरों
मेरे वजूद को ही मार दिया
मेरे औरत होने पर
एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया
धिक्कारती हुई सी चीख निकली
मेरे टूटते जिस्म से,
आवाज रुंध गई जैसे कंठ में
भीग कर
कोयले की कालिख में
मेरा तन
निर्जीव हो गया
जिसने भी सुना मुझे ही
कोसता गया
आज जिन्दगी के मैले बर्तन से
निकल कर,
दुर्गंध छोड़ते समाज के चंगुल से मुक्त हो कर,
जा रही हूँ,
न्याय की आशा नहीं है पर
अभिलाषा लेकर जा रही हूँ।।

Comments

5 responses to “चीख”

  1. Praduman Amit

    नारी के प्रति अपने बहुत ही सुन्दर भाव में कविता को अंजाम दिया है। नारी की अभिलाषा जिस दिन पुरुष समझ जाएगा उस दिन से नारी पर जुल्म होने का अंत भी हो जाएगा

    1. Pragya

      इतनी सुंदर समीक्षा हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद

  2. vikash kumar

    Great

    1. Pragya

      धन्यवाद आपका

  3. मार्मिक रचना 

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