चोट

फ़लक से उठा कर,
ज्यों जमीं पर पटक दिया हो
दर्द दे दिया है ऐसा
न जाने लग रहा है कैसा
दिल की चोट का पता नहीं है
पर कमर में दर्द बहुत है
सर्द हवा से चोट में
देखो ना चुभन बहुत है
लगा दो प्यार से मरहम,
तनिक दर्द हो ये कम
चैन हमें भी आए थोड़ा
सुकूं की सांस ले पाए हम
_____✍️गीता

Comments

6 responses to “चोट”

  1. दर्द का एहसास कराती हुई रचना
    वाकई में आपकी कविता पढ़कर एक टीस सी उठ रही है

    1. Geeta kumari

      इतनी सुन्दर समीक्षा के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा जी

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद संदीप जी

    1. Geeta kumari

      सादर धन्यवाद भाई जी🙏

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