चौमास की अर्द्धगन्ध’

मेरे हिस्से की स्वांस पूछती है-
रात्रि में श्यामल ओस से लक्षित
वह कौन-सा
प्रतिबिंब है जो सुनाई तो देता है,
परंतु दिखाई नहीं देता
चौमास की अर्धगन्ध से बने
पुतलों से फूले हुए पलस्तर
गिरते हैं••
सहनशक्ति भरी रेत खिसकती है खुद-ब-खुद,
विलक्षण शंका के तिलस्मी खोह का
एह शिला द्वार खुलता है अर्र्ररररर…..
सम्भावित स्नेह के विवर में,
शीश उठाये लाल मशाल जलाकर
द्वेष नामक पुरुष समा जाता है•••
आखिर वह कहाँ जाता है ! !

Comments

2 responses to “चौमास की अर्द्धगन्ध’”

  1. Praduman Amit

    भावपूर्ण रचना

    1. धन्यवाद 

Leave a Reply

New Report

Close