छुपा है चाँद बदली में ,अमावस आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
मिलन की रात में ये घुप्प अँधेरा क्यों सताता है ?
वो मेरा और उसका छुप छुपाना याद आता है..
अभी तो थी फ़िज़ा महकी , क़यामत आ गयी है क्या?
कभी वो थी कभी मैं था, कभी चंचल चमकती रात,
न वो कहती ,न मैं कहता मगर आँखे थी करती बात..
जिन आँखों में हया भी थी,कज़ा अब आ गयी है क्या?
वो नदियों के किनारो पर जहाँ जाता था मिलने को,
वो नदियां है क्यों प्यासी सी, बुलाती है बुलाने को,
उन्ही नदियों की रहो में रुकावट आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
…atr
छुपा है चाँद बदली में…

Comments
7 responses to “छुपा है चाँद बदली में…”
-

kya baat he abhishek bhai
-

Shukriya dost ..
-
-

laazbaab dost!
-

bahut dhanyavad yar
-
-

gud one yaar
-

thank u .. 🙂
-
-
मेरा और उसका छुप छुपाना याद आता है..
वाह वाह बहुत खूब
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.