जब चाँद भीगता था

“जब चाँद भीगता था छत पर”

बहका सावन-महकी रुत थी,
ये हवा भी मीठी चलती थी.
जब चाँद भीगता था छत पर,
तब बारिश अच्छी लगती थी.

वो बाल खुले बिखरे-बिखरे,
होठों पे’ कभी आ रुकते थे.
तेरे गालों से होकर के,
बूंदों के मोती गिरते थे.
आकर मेरी खिड़की पर तब,
चिड़िया बनके तुम उड़ती थी.
जब चाँद भीगता था छत पर,
तब बारिश अच्छी लगती थी.

कमरे की तन्हाई मेरे,
इक पल में गुल हो जाती थी.
जब मीठे -हलके क़दमों से,
यूँ सीढ़ी से तुम आती थी.
कानों की वो छोटी बाली,
तब सच में तुम पर फबती थी.
जब चाँद भीगता था छत पर,
तब बारिश अच्छी लगती थी.

पास मे’रे जब रहती थी तो,
ये दिल भी तेज धड़कता था.
दुनिया ज़न्नत सी लगती थी,
और सब कुछ अच्छा लगता था.
कमरा खुशबू से भर जाता,
जब शरमा के तुम हँसती थी.
जब चाँद भीगता था छत पर,
तब बारिश अच्छी लगती थी.

अब दूर हुये हो जबसे तुम,
मौसम भी हमसे रूठ गया.
ख़्वाबों में आने – जाने का,
अब वो’ सिलसिला भी टूट गया.
ये पल है’ कि नाराज़ हो तुम,
तब अपनी कितनी बनती थी.
जब चाँद भीगता था छत पर,
तब बारिश अच्छी लगती थी.

जब चाँद भीगता था छत पर,
तब सावन कितना अच्छा था.
अब सावन भी तो खार लगे,
तब आँसू मीठा लगता था.
मैं नीचे छत से नहीं आता,
माँ कितना गुस्सा करती थी.
जब चाँद भीगता था छत पर,
तब बारिश अच्छी लगती थी.

–डॉ.मुकेश कुमार (राज गोरखपुरी)

Comments

3 responses to “जब चाँद भीगता था”

  1. karan aatre Avatar
    karan aatre

    beautiful!!! 🙂

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