जब जीवन की हो अंधियारी रात

मोहब्बत की अद्भुत है दास्तान,
कब शुरू हुई और
कब चढ़ी परवान।
चाॅंद तारों की ख्वाहिश नहीं है,
बस मिले मधुर मुस्कान ।
या फ़िर हो सुगन्धित फूल,
कुछ कम हों हृदय के शूल।
जब ऑंखें नम हों जाऍं मीत,
कह देना तुम कोई गीत।
जब जीवन की हो अंधियारी रात,
रौशन कर देना, देकर साथ।
नहीं रहेंगी फिर ऑंखें नम,
मिट जाऍंगे सारे दर्द-ओ-ग़म॥
_____✍गीता

Comments

8 responses to “जब जीवन की हो अंधियारी रात”

  1. Rohit

    बहुत सुन्दर रचना गीता जी

    1. धन्यवाद रोहित जी

  2. Amita

    बेहतरीन सृजन

    1. धन्यवाद अमिता जी

  3. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति दीदी जी

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद एकता

  4. कवि गीता जी की  बहुत सुंदर रचना। कोमल भावों को सुन्दर शब्दों में गढ़ा गया है।

    1. Geeta kumari

      सुन्दर टिप्पणी और प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी

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