जब भी मैं तुझसे कहीं पर मिलता हूँ,
सोचता हूँ कि कम से कम आज तो,
तेरे आँचल में सर रख कर तुझको
निहारता हूँ,
इसी तमन्ना में अक्सर मेरा तुझको यूँ ही देखना,
मेरे देखने पर तेरा शरमा कर नज़रे झुका लेना,
फिर तिरछी निगाहों से मुझे खुद पर से नज़रे हटाने को कहना
मेरा नज़रे तो हटा लेना पर, अगले ही पल,
दिल में हजारों सवालों का आ जाना,
कि,
कैसे हटा लूँ ये नज़र तेरे चेहरे पर से,
जब मेरी आँखों को सिर्फ इसी ताज से चेहरे को,
देखने की आदत पड़ गयी हैं,
चलो इन नजरों को हटा भी लिया
तो इन हाथों का क्या करूँ,
जिन्हें बस तेरे उन छोटे से कोमल हाथों के
स्पर्श की आदत पड़ गयी हैं,,
चलो इन हाथों को हटा भी लिया
तो इन क़दमों का क्या करूँ,
जो सिर्फ तेरी झरने सी आवाज सुन कर,
खुद-ब-खुद ही तुझ तक बढ़ने लगते हैं,
चलो इन क़दमों को भी थाम लिया,
तो इन होंठों का क्या करूं,
जो अक्सर मिलते हैं तो सिर्फ तुम्हारे
उस प्यारे से नाम की इबादत करने के लिए!!!
चलो इन होंठो को भी सीं लिया तो
इस दिल का क्या करूँ,
जिसके हर एक कोने में बस,
तुम ही तुम रहती हों!!!
चलो इस दिल को …………………………
जब भी मैं तुझसे
Comments
7 responses to “जब भी मैं तुझसे”
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welcome back.. nice poem
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achi kavita…kese ho ankit bhai
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khubsurat!!
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Gracias 🙂
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वाह
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इस दिल का क्या करूँ,
जिसके हर एक कोने में बस,
तुम ही तुम रहती हों!!!
चलो इस दिल को …………………
बहुत खूब -

बहुत ही सुंदर
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