जाग उठ जा

जाग उठ जा, अब पथिक
पूरा सवेरा हो गया है,
देख ले खिड़की से बाहर
सब अंधेरा खो गया है।
क्या पता क्या थी कशमकश
नभ-धरा के बीच में
रात भर का प्रेम रण वह
ओस बूंदें बो गया है। ।

Comments

13 responses to “जाग उठ जा”

    1. सादर धन्यवाद जी

  1. Geeta kumari

    बहुत ही सुन्दर काव्य रचना।
    “क्या पता थी कश्मकश नभ – धरा के बीच में”
    समीक्षा के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं सर….
    अद्भुत लेखन। सैल्यूट…

    1. आपके द्वारा की गई इस सुंदर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

      1. Geeta kumari

        Welcome ji

  2. Devi Kamla

    Nice poem

    1. Satish Pandey

      Thanks

  3. Indu Pandey

    बहुत बढ़िया वाह जी

    1. Satish Pandey

      Thanks

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