जाने कहाँ चले जाते हैं

जाने कहाँ चले जाते हैं
सांस उखड़ी, धड़कन रुकी
उड़ जाते हैं पखेरू, फिर
जाने कहाँ चले जाते हैं।
कुछ देर पहले ही बोलना
सारी संवेदना महसूस करना
कुछ देर बाद ही मौन हो जाते हैं
जाने कहाँ चले जाते हैं।
क्या बनाया है मायाजाल
जाने तक उसी में समाये रहते हैं,
सोचते हैं कभी नहीं जाऊंगा
लेकिन जाने का पता ही नहीं लगता,
जाने कहाँ चले जाते हैं।

Comments

16 responses to “जाने कहाँ चले जाते हैं”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    बहुत ही मार्मिक भाव….
    “जाने कहां चले जाते हैं,सांस उखड़ी धड़कन रुकी
    उड़ जाते हैं पाखेरू,फिर जाने कहां चले जाते हैं”
    किसी अपने के दुनियां से जाने के गम की बहुत सलीके से अभिव्यक्ति की है। लेखनी की विलक्षण प्रतिभा को प्रणाम ।

    1. Satish Pandey

      आपके द्वारा की गई इस बेहतरीन समीक्षा हेतु सादर आभार व्यक्त करता हूँ। आपकी लेखनी की यह विलक्षणता बनी रहे। सादर अभिवादन।

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      Thank you

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  3. MS Lohaghat

    अतिउत्तम

    1. Satish Pandey

      Thank you

  4. Piyush Joshi

    Very nice

    1. Satish Pandey

      Thank you ji

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