“जिंदगी भर ये क्या इन्तेज़ाम किया हमनें”

जिंदगी भर ये क्या इन्तेज़ाम किया हमनें।
इक उम्र तो बस यूँ ही तमाम किया हमनें।।
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पता नहीं किस ख़्वाहिश में दर ब दर हुए।
न सुकून ही मिला न आराम किया हमनें।।
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लिखें कई अधूरे अफ़साने क्यूँ मैंने खुद से।
पढ़ के सोचतें है ये कोई काम किया हमनें।।
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मिलने आती है मंजिलें ख़ुद हमसे अक्सर।
उन्हें पता है रास्ते को मकाम किया हमने।।
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ये क्या फिर वही साहिल फिर वही संमदर।
चलों चले रोज़ की तरह शाम किया हमनें।।
@@@@RK@@@@

Comments

4 responses to ““जिंदगी भर ये क्या इन्तेज़ाम किया हमनें””

  1. Kumar Bunty Avatar
    Kumar Bunty

    KAFI UMDA

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. Abhishek kumar

    Good

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