जीना भूल गये

तुम क्या गये
हम तो जीना भूल गए ।
तेरा छाया था कैसा सरूर
तेरा होके था खुद पे गुरूर
सच झूठ की कालीमा से बाहर आया
हम प्यार पे विश्वास करना भूल गए
हाँ, हम तो जीना भूल गए ।

Comments

8 responses to “जीना भूल गये”

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  1. बहुत ही उम्दा रचना

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब

    1. Suman Kumari

      सादर आभार

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