तुम क्या गये
हम तो जीना भूल गए ।
तेरा छाया था कैसा सरूर
तेरा होके था खुद पे गुरूर
सच झूठ की कालीमा से बाहर आया
हम प्यार पे विश्वास करना भूल गए
हाँ, हम तो जीना भूल गए ।
जीना भूल गये
Comments
8 responses to “जीना भूल गये”
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अतिसुंदर भाव
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सादर धन्यवाद
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बहुत ही उम्दा रचना
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सादर धन्यवाद
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Bahut Khoob, Atisundar
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सादर धन्यवाद
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बहुत ख़ूब
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सादर आभार
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