सत्य को समझने की
नजर,
जरूर मायने रखती है,
रहस्य समझने वाली
जिन्दा आत्मा
अपने भीतर आयने रखती है।
जो देख लेती कमियाँ
अपनी देहजनित,
त्याग देती हैं
लोभ नेहजनित।
खूब इकट्ठा करते जाना,
फिर उसे खा न पाना,
छोड़ कर ऐसे ही पोटली में
धरती से चले जाना।
भूख की स्थिति में
खा न पाना,
जब पेट साथ न दे तब
खाने की अभिलाषा रखना,
अभिलाषा का अभिलाषा ही
रह जाना,
अचानक अलविदा कह जाना,
कल खाऊंगा की आस में
कल का कभी न आ पाना,
यही कथ्य है,
जीवन का सत्य है।
जीवन का सत्य है
Comments
2 responses to “जीवन का सत्य है”
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जीवन के सत्य को परिभाषित करती हुई कवि सतीश जी की अति उत्तम रचना, उच्च स्तरीय लेखन
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भाव झलकती है।
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