हर निभाने के दस्तूर क़र्ज़ है मुझ पे गोया रसीद पे किया कोई दस्तखत हूँ मैं राजेश'अरमान '

5 Comments

  1. नब्ज़ भी कुछ तेज थी ,फ़िज़ां भी थी कुछ बीमार
    वो तेरे मौसम का इक ज़ख्म था ,जो अब न रहा ………….. Subhan Allah

Leave a Reply