ठहर जा शिकारी

ठहर जा शिकारी
मत करो शिकार
पर आज भी जारी है
पशु पक्षी का संहार
कुछ विलुप्त हो गए धरा से
कुछ खड़े हैं कगार
जैसे गिद्ध मृत्यु प्राप्त जानवरों को खाते हैं
आज कल नजर नहीं आते हैं
जंगल के राजा जंगल को छोड़ गए
जब से इंसान लालच से रिसता जोड़ गए
उपेक्षित और विलुप्त हो रहे जानवर
धरती की शोभा बढ़ाते हैं
पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन लाते हैं
मत करो कैद इन्हें जंगल ही भाते हैं
ठहर जा शिकारी
करना नहीं शिकार
इनको भी है
जीने का अधिकार
सालिम अली के जैसे
करो तुम प्यार

Comments

2 responses to “ठहर जा शिकारी”

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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