ठेके का रिक्शा खींच दिन भर

आ बैठ जा
मैं गीत लिख दूँ आज तुझ पर
है उपेक्षित तू सदा से
ठण्ड की रातों में
सोता है खुली ठंडी सड़क पर।
ठेके का रिक्शा खींच दिन भर
जो कमाता है उसे
भेजता है गांव में परिवार को,
रोज खपता है भले
रविवार हो शनिवार हो।
हांफ जाता है चढ़ाई पर
जोर टांगों से लगाकर
शक्ति को पूरी खपाकर
मंजिलें देता पथिक को,
सब यही कहते हैं कम कर
कोई नहीं देता अधिक तो।
जो मिला कम खा बचा
कर्तव्य अपने है निभाता
पत्नी-बच्चे, वृद्ध वालिद
पेट भरकर है खिलाता।
इस तरह तू इस शहर में
खींच रिक्शा है कमाता
जिन्दगी को जिन्दगी भर
खींच कर अपनी खपाता ।

Comments

4 responses to “ठेके का रिक्शा खींच दिन भर”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है आपने
    “शक्ति को पूरी खपाकर
    मंजिलें देता पथिक को,
    सब यही कहते हैं कम कर
    कोई नहीं देता अधिक तो।”
    बहुत ही सुंदर और विचारणीय पंक्ति है पाण्डेयजी। अतिसुंदर भाव पूर्ण रचना।

  2. अति सुन्दर रचना

  3. Geeta kumari

    “आ बैठ जा
    मैं गीत लिख दूँ आज तुझ पर है उपेक्षित तू सदा से
    ठण्ड की रातों में सोता है खुली ठंडी सड़क पर।
    ठेके का रिक्शा खींच दिन भर”
    एक रिक्शा चालक पर इतनी करुणा और दया दिखलाती हुई कवि सतीश जी की बहुत ही मार्मिक और भावुक अभिव्यक्ति वाली बहुत सुंदर कविता। गरीबों के लिए हृदय में दया भावना उत्पन्न करने वाली बहुत ही उत्तम प्रस्तुति

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