अनुकूल वातावरण
मुश्किल से मिलता है
या तो स्वयं ढलना पड़ता है
या उसे अपने अनुसार
ढालना पड़ता है।
कर्म किए बिना
कुछ नहीं होता है
कर्म के बावजूद परिणाम में
ईश्वर की इच्छा को ही
मानना पड़ता है।
आग जलाने को
माचिस को रगड़ना ही पड़ता है
भाग जगाने को
परिश्रम करना ही पड़ता है।
ढलना पड़ता है
Comments
8 responses to “ढलना पड़ता है”
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सही कहा आपने
बहुत सुन्दर विचार-
बहुत बहुत धन्यवाद
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परिश्रम की महत्ता बताती हुई कवि सतीश जी की बहुत सुंदर रचना
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बहुत बहुत धन्यवाद
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सुन्दर
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बहुत धन्यवाद
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अतिसुंदर भाव
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सादर धन्यवाद
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