तक़दीर अपनी अपनी

पत्थर से फूल पे ,यों न वार कीजिये
जरा सोच समझ के एतवार कीजिये
हमारे इशारे पे ही घटा रंग बदलते है
कोई कोई तो कुर्बान भी हो जाते है
टक्कर देना तुम्हें आया ही कब था
बर्बाद हो गए तो यह तुम्हारा नसीब था

Comments

One response to “तक़दीर अपनी अपनी”

  1. वाह क्या बात है।।

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