Praduman Amit's Posts

गंगा काशी

माँ बाप को दु:ख न देना उसने ही तुम्हें चलना सिखाया जिस पैर पर चल कर तुमने कामयाबी हासिल की उसी पैर पर उसने कभी अपनी जान न्योछावर किया । हंसना सिखाया बोलना सिखाया आज तुम हो गए इतने बड़े कि डांट कर बोलती बंद कर देते हो उसे अपनो से कमजोर समझ के। तीर्थ कर के तीर्थराज बनते हो अरे नादान सारे तीर्थस्थान तो तेरे घर में विराजमान है अपनी काली पट्टी तो खोल देख गंगा काशी तेरे घर में है। »

वफा के बदले

खट्टी मीठी यादों से आज उस बेवफा की तस्वीर बनाई। दिल में आ कर देखिए दूर हो गया आज सनम हरजाई।। अक्सर मैं सुना करता था प्यार में रब बसता है। गर रब बसता है तो मैने मुहब्बत में धोखा क्यों खाई।। »

दीदार

अब चलें काफी रात हो गई । आपसे मेरी दो बातें हो गई।। वक्त और ठंड के तकाजा है। चलो आप से दीदार तो हो गई।। »

गरीब की दीवाली

गरीब के घर में झांकीए कैसे मनाते है निर्धन दीवाली। मन में उमंगों की पटाखे फोर कर निर्धन ऐसे मनाते है दीवाली ।। दीया है बाती है मगर तेल नहीं लाला भी आज उधार देगा नहीं। मन में ख्वाईशें तो थी अनेक चलो यह वर्ष न सही अगले वर्ष ही सही।। मुनिया की मम्मी मुनिया के पुरानी कपड़े धो देना क्योंकि,। आ गयी है इस वर्ष की दीवाली।। »

एक ही दीया

हम सब दीप तो जलायेंगे, बाहरी अंधेर को दूर करने के लिए। मगर हम वो दीप कब जलायेंगे मन में छिपे अंधेर को दूर करने के लिए।। हम हर वर्ष बड़ी उल्लास के साथ घर आंगन में जलाते है अनेक दीया। छल कपट के छाती पर कब हम जलायेंगे स्वच्छता के “एक ही दीया” ??।। »

वाह !! कहीं कहीं…..

कहीं दीप जले तो कहीं , गरीब के घर में चूल्हा न जले। हम खुशियाँ मनाते रहे और वो, अंधेरे में माचिस खोजते रहे।। कहीं दीपावली की धूम तो कहीं पापी पेट में भूख की शहनाई। गगन में देखो रंग बिरंगी पटाखे वाह रे दुनिया क्या मस्ती है छाई ।। »

गरीब के लाल

नये कपड़े, नयी उमंग, पटाखे और डिब्बे की मिठाई । गरीबी में पल रहे लाल के किस्मत में कहाँ है भाई ।। दीप जला कर खेल कूद कर। अपनी शौक को खुद में ही, कभी सिमटते हुए देखा है भाई?।। »

क्या से क्या हो गया

हम दीवाली क्या मनाए दीवाली तो करोना ले गए। थी जुस्तजू मुझे भी मगर साल २०२० हमें बर्बाद कर गए।। हमे क्या पता था देश में कभी ऐसे भी दिन आयेंगे। बुरे वक्त पे रिश्ते नाते भी अपनो के साय से दूर भागेंगे।। »

दु:ख

कभी कभी दु:ख को गले लगा कर भी जीना पड़ता है। तभी तो सुख से ज्यादा इस जहाँ में दुःख की महता है।। जब तक इंसान के जीवन के धड़कन की डोर चलती है। तब तक ए अमित रंग बिरंगी दु:ख हमारे साथ कहाँ छोड़ती है।। »

पुरानी दास्तां

एक दिल कहता है, फिर एक मर्तबा किसी से इश्क़ कर। दूसरा दिल कहता है, ए नादान पुरानी दास्तां से तो डर।। »

महफूज

चल घटा जो हुआ इश्क़ में, शायद अच्छा ही हुआ। कम से कम नादान दिल, तीर ए नजर से तो बचा।। »

बेवजह

मुहब्बत में मुकाम तो मिलता है मुकद्दर वालों को। हम बेवजह ही आज़माए अपनी सोए मुकद्दर को।। »

जैसी करनी वैसी भरनी

एक बहू अपनी सास को हमेशा भला बुरा कहा करती थी। सास चुपचाप रह जाती थी। क्योंकि उसका पति नहीं था। एक बेटा भी था तो वह बीवी के गुलाम बन कर ऐश की ज़िन्दगी गुजार रहा था। समय के पहिया यों ही घूमता गया। सास बेचारी पानी पानी कह कर मर गयी। मगर बहू ने पानी तक नहीं दिया। बहू व बेटे दोनों मिल कर खूब दानपुन किया। ताकि माँ की आत्मा को शांति मिल सके। और उसे किसी भी काम में बरकत हो। मगर ऐसा नहीं हुआ। दिनोदिन कर्ज... »

हंसते हंसते

कोई उसे जान से भी ज्यादा चाहा था किसी बेवफा को। उसने पल में ही तोड़ दिए सपने हंसते हंसते किसी को।। »

मुझे यह गम नहीं

ए मेरे दोस्त मुझे यह गम नहीं कि तुम मेरे न हो सके, गम तो इस बात की है कि तुम मुझे कभी समझ न सके। »

कहाँ गया वो ? (रहस्य रोमांच) भाग — २

आपने भाग १ में पढ़ा – (राम उसे देख कर बुरी तरह से डर गया। वह बांध के नीचे से रास्ते के तरफ आ रहा है। आखिर वह राम से क्या चाहता है। जबकि राम अपनी कंठ को अपनी ही थूक से बार बार भीगो रहा था)अब आगे वह अधेर उम्र की व्यक्ति राम से दस गज की दूरी बना कर बीच रास्ते पर खड़ा हो गया। कुछ देर बाद उसने कहा “मुझे प्रतिदिन इसी समय एक लीटर दूध चाहिए। क्या तुम दोगे” ?राम, जबाब में सिर हिलाया। R... »

कहाँ गया वो ? (रहस्य रोमांच)

छपरा जिला के सांई गाँव में ग्वालों की घनी आवादी थी। वहाँ के लोग गाय भैंस पाल कर ही अपना घर परिवार चलाते थे। उसी गाँव में राम नाम का एक ग्वाला था। वह प्रतिदिन शाम के समय बाजार में दूध बेचने जाया करता था। कभी कभार घर लौटने में देर हो जाया करता था। उस रात भी उसे देर हो चुकी थी। रात के यही कोई दस या सवा दस का वक्त था। वह अपनी साईकिल से मस्ती में आ रहा था। रास्ता सुनसान की आगोश में सो चुकी थी। रास्ते म... »

थी जुस्तजू दिल को मगर…

रास्ते के पत्थर समझ के, ठोकर मार कर चले गए वो। हम किनारे पे खड़े रहे, किसी के हो कर गुजर गए वो।। »

हाय रे किस्मत

खुद को जला के हम, अपनी प्यास कहाँ बुझा पाए। समंदर भी मुझे देख कर , अपनी धारा बदलती जाए ।। »

सच्चे मन से

रावण जलाना ही है तो मन में छिपे रावण को जलाओ। गर तुम से न जले तो सच्चे मन से श्री राम को बुलाओ।। »

अधर्म पे धर्म की विजय

जब जब धर्म अधर्म के चंगुल में फंसा, तब तब इस धरती पे पुरुषोत्तम का जन्म हुआ। अत्याचार से धरती फटी अधर्म से नील गगन, तभी तो दिव्य पुरुष के हाथों अधर्मी का अंत हुआ। बुराई पे अच्छाई की जीत तो एक दिन होना हो था, “ढोल शूद्र पशु नारी” यही अधर्म के कारण पापी का आज अंत हुआ। »

सुरक्षा कवच

रावण जलाया तो क्या जलाया, दिल के रावण जलाओ तो जाने । तुम्हारी ढकोसला षडयंत्र को हम, अपनी सुरक्षा कवच क्यों माने।। »

नीली गहराई

चलो इश्क़ की दरिया में कूद कर देखते है। सुनता हूँ नीली गहराई का कोई अंत नहीं है।। »

दो रास्ते

एक रास्ता मय़खाने की ओर दूसरा रास्ता शबाब की ओर। उतावला दिल किधर जाए इधर जाए या उधर जाए।। »

इश्क़ के मारा दो बेचारा

हम तो गिर कर भी संभल नहीं पाए क्या करें चाहत की डोर ही कुछ ऐसी थी। वो कहते रहे चिंगारी से कभी न खेलना हम जान कर भी अनजान बने रहे क्या करे हमारी तकदीर ही कुछ ऐसी थी जब मिला मैं इश्क़ के जौहरी से — उसने कहा अश्क़ न बहा ए मुकद्दर के फकीर आशिक़ जो हाल तेरा है वही हाल कभी मेरी भी थी। »

लोग कहने है मुहब्बत किसी १ से होता है। क्या इस युग में भी किसी १ से ही होता है।। »

……. क्या तुमने कभी

कौन कहता है कागज के फूलो से , कभी खुशबू आ नहीं सकती है। मैं कहता हूँ – क्या तुमने कभी, कागज के फूलो पे सच्चे मन से- महबूबा के नाम लिख कर देखा है।। »

बरसात

जब हुई आँखों से, अश्कों की बरसात। तब याद है मुझे,थी वो बरसात की रात।। »

बेवफा से वफ़ा

दिल ले के वो नादान, दग़ाबाज़ी करते चले गए। रेत में हम उनके लिए, महल बनाते चले गए।। हमें क्या पता था, खूबसूरत समंदर की बेवफ़ाई। हम तो समंदर की सुरत पे, एतवार करते चले गए।। जो होना था सो तो हो गया, क्या करे “अमित ” । ए आँखें भी बिन सावन के ही, बरसते चले गए।। »

सड़कछाप आशिक़

दिल फेंक आशिक़, सड़क पे अक्सर मिल ही जाते है। गर बोलो दो मीठी बातें तो, जल्द ही मजनू बन जाते है।। »

क्या से क्या हो गया

चारो दिशाओं में आज मतलबी इंसान बसते है। तभी तो आज हमारे मन में नफरत ही पलते है।। »

अर्शे बाद…

मैं दोस्तों के अंजुमन में, अर्शे बाद आया हूँ। खुद को थाम लीजिए मैं फिर वही दिल लाया हूँ।। »

जुल्म से कांपी इंसानियत

जब जब ज़ुल्म की जलजले इस ज़मीन पे फन फैलाया। तब तब इन्सान की इंसानियत खून की आँसू ही रोया।। »

क्या जिंदगी है

बचपन में खेल का तकाजा, जवानी में मौसम के तकाजा तो बुढ़ापे में उम्र की तकाजा ।। जब आ जाए अंतिम घड़ी , उठ जाता है हम सब के जनाजा ।। »

लत

तुम हर मर्तबा यही कहते हो, इश्क़ बुरी लत है। चुपके चुपके दिल चुरा लेना,ए कौन सा लत है।। »

पत्थर दिल

अश्क़ बहा के भी उस बेवफा को मैं अपना न सका। उनको खबर थी मेरी हालत फिर भी वो बेखबर रहा।। »

लेखक की गरीबी (३)

(भाग दो में आपने पढ़ा – रुपा अपने पति के पेट की आग बुझाने के लिए खुद को दिलचंद के हाथों बिकने के लिए तैयार हो जाती है। वह अपने पति के ख़ातिर इज्ज़त क्या अपनी जान तक न्यौछावर कर सकती है। दिलचंद उसकी इज्ज़त दूकान के चंद पैसों के उधार से वह खरीदना चाहता है। क्या , दिलचंद रुपा के इज्ज़त को खरीद पाता है? क्या जीवनबाबु अपनी पत्नी को दिलचंद के हाथों बेच देता है?) यह जानने के लिए अब आगे — रुपा... »

दम नहीं तुझ में

अरे पागल आशिक़ बस इतने में ही तुम घबड़ा गए। ज़ुल्म के दौड़ आया ही नहीं तुम अभी से घबड़ा गए।। »

गर दम नहीं

प्यार भी करती हो ज़माने से भी डरती हो। गर दम नहीं है तो दो नाव पे क्यों चढ़ती हो।। »

इश्क़ फरमाते है

चलो हम तुम इश्क़ फरमाते है। ज़माना यों ही जल जल मरते हैं।। »

दिल है कि मानता नहीं

इश्क़ हम करते कहाँ है ए दिल ही फिसल जाता है। दिल को क्या समझाएं जब देखो बर्बाद हो जाता है।। »

वश

ए अमित इश्क़ भी क्या बीमारी हैं। इश्क़ पे वश न हमारी है न तुम्हारी है।। »

चाहत

सोचा था अपनी मुकद्दर को एक नया नज्म देंगे। उन्हीं नज्म के आर में हम उनकी दास्तां लिखेंगे।। »

दीवाना

दिन गुजर गए महीने गुजर गए साल गुजर गए। किसी की चाहत में, हम खुद को ही भूल गए।। »

लेखक की गरीबी (२)

आपने पहले अंक में पढ़ा — जीवनबाबु के घर में अन्न के एक दाना तक नहीं है। रुपा एक भारतीय नारी की परंपरा पर चलने वाली है। वह अपने पति को भूखे पेट सोने देना नहीं चाहती है। जीवनबाबु के कहने पर रुपा दिलचंद बनिया के पास उधार राशन लाने के लिए चल पड़ती है। जबकि पिछला हिसाब भी चुकता नहीं हो पाया है… (अब आगे) कुछ देर बाद रुपा दिलचंद बनिया के दूकान पर पहुंच गई। दिलचंद रुपा को देखते ही कहा –&... »

उफ़…

दांतों तले आंचल दबा लेना। उफ़… कहाँ गया वो ज़माना।। »

सिखे कहाँ से

दिल ले के दर्द देना, यह अदा सिखे कहाँ से। बताइए न यह राज़,आपने ने सिखे कहाँ से।। »

लेखक की गरीबी

जीवनबाबु अपने मोहल्ले में प्रतिष्ठत व्यक्ति थे। वह एक साहित्यकार भी थे। हमेशा किसी न किसी पत्र व पत्रिकाओं के लिए रचनाएं तैयार करते थे। उनकी पत्नी रुपा इतनी सुंदर थी कि वह कभी कभार अपनी पत्नी को ही देख कर कविता, गीत व ग़ज़ल रच लिया करते थे। कमी थी तो केवल अर्थ व्यवस्था की। वह अपना घर परिवार चलाने के लिए प्राइवेट कोचिंग व स्कूल में पढ़ाया करते थे। तब कहीं जा कर दो वक्त की रोटी जुटा पाते थे। कभी कभा... »

पागल आशिक़

लोग कहने लगे है, हम इश्क़ में पागल हो गए है। मैं कहता हूँ इश्क़ में पागल तो कोई कोई होते है।। शाहजहाँ भी मुमताज़ के लिए ही पागल हो गया। इसलिए आगरा में मुमताज़ महल प्रसिद्ध हो गया।। »

झूम झूम के…..

हमने उड़ते हुए बादल से पूछा कब तुम्हें बरसना है। उसने कहा नादान यह भी कोई पूछने की बात है ।। सभी को वफा के आशियाना तो एक मर्तबा बनाने दो। फिर देखना कैसे हम आँखों से झूम झूम के बरसते है।। »

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