तकिया
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रोती रही कईयों दिन तक,
दोस्त खबर भी देते रहें,
हम भी रोते घर बैठे,
जब कोई पूछे हाल मेरा,
झूठी हंसी दिखाते रहें,
कब सोया कब जागा हूं,
मैं जानू या रात ही जाने,
आकर देख मेरे तकिए को
है गीली आंसू से,
उसे नहीं सिखाया हूं,
कैसे धूप में रख दूं उसको,
तकिया है कपड़ा ना,
डरता हूं घरवालों से पूछेंगे कैसे भीगी
कुछ भी जवाब दे पाऊं ना
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’——-
तकिया
Comments
4 responses to “तकिया”
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बहुत सुंदर
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Tq
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बहुत ख़ूब लिखा है
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अतिसुंदर
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