तपिश में इक छाॅंव..

उदासी का समन्दर है इन नयनों में,
उठती हैं लहरें बेचैनी की।
फिर ऑंखों से रिसता है पानी,
यही है इस जीवन की कहानी।
कोई जब लेकर आए इक नाव,
निकालने को इस समन्दर से,
मिटाने को हर इक घाव..
छलक जाता है मेरा दर्द उसके नयनों में,
दे जाता है तपिश में इक छाॅंव॥
_____✍गीता

Comments

4 responses to “तपिश में इक छाॅंव..”

  1. Amita

    करूण अभिव्यक्ति दीदी जी 🙏

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद अमिता

  2. रोहित

    बहुत सुंदर रचना

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद रोहित जी

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