तू न समझे बस यही दुआ है मेरी,
समझ में अक्सर दिल जला करते हैं।
तू नासमझ है और न ही तू समझना कभी ,
न दिल मेरा लगे तुझसे और , न तू लगाना कभी।
जख्म जो सूख गया है मेरा, न अब तू गलाना उसे ,
दिल जो टूटा है मेरा, तू दिल से न लगाना उसे।
दिल जो लगा तो हंसी रात ये गुजर जाएगी,
और सुबह होते ही तू आसमान में उड़ जाएगी।
समझ के भी नासमझ बनु में, और तू नासमझ ही रहे,
बस इतनी सी दुआ है मेरी
– शिवम् दांगी
तू नासमझ ही रहना …….
Comments
3 responses to “तू नासमझ ही रहना …….”
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जख्म जो सूख गया है मेरा, न अब तू गलाना उसे ,
दिल जो टूटा है मेरा, तू दिल से न लगाना उसे।
_________ कवि शिवम दांगी जी की कविता में किसी बात को दिल से ना लगाने की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है। बहुत सुंदर पंक्तियां -
बहुत खूब
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बहुत सुन्दर रचना
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