तेरे अंतस् में सखी
उठा है जो भी ताप
कल वह सब बुझ जाएगा
जब आएगा नवल प्रभात
इच्छा यह मेरी है कि विजय
होगी तुम्हारी
जिस कारण तुम रूठी
वह बातें मिथ्या सारी
तेरी मंजिल तुझको कल मिल जाएगी
प्रज्ञा फिर भी यहीं रहेगी
लौट कहीं ना जाएगी….
तेरे अंतस् में सखी…
Comments
6 responses to “तेरे अंतस् में सखी…”
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वाह
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Thank you so much
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Great
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बहुत-बहुत आभार
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Bahh…. amazing words
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आपका बहुत-बहुत धन्यवाद
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