तेरे अंतस् में सखी…

तेरे अंतस् में सखी
उठा है जो भी ताप
कल वह सब बुझ जाएगा
जब आएगा नवल प्रभात
इच्छा यह मेरी है कि विजय
होगी तुम्हारी
जिस कारण तुम रूठी
वह बातें मिथ्या सारी
तेरी मंजिल तुझको कल मिल जाएगी
प्रज्ञा फिर भी यहीं रहेगी
लौट कहीं ना जाएगी….

Comments

6 responses to “तेरे अंतस् में सखी…”

    1. Pragya Shukla

      Thank you so much

  1. vikash kumar

    Great

    1. Pragya Shukla

      बहुत-बहुत आभार

    1. Pragya Shukla

      आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

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