थकी सोई हुई लहरों को चलकर थपथपाते हैं————————

थकी सोई हुई लहरों को चलकर थपथपाते हैं

समंदर में चलो मिलकर नया तूफान लाते हैं।

न आये पांव में छाले तो मंजिल का मजा कैसा
सफर को और थोड़ा सा जरा मुश्किल बनाते हैं।

अंधेरे में बहुत डरती है घर आती हुई लड़की
अभी सूरज को रुकने का इशारा करके आते हैं।

गया हो घोंसले से जो परिन्दा फिर नहीं लौटे
कभी जाकर के देखो पेड़ वो आंसू बहाते हैं।

हमें मालूम है कागज की कश्ती डूब जायेगी
मगर ये देखते हैं इससे कितनी दूर जाते हैं।

उन्हें मालूम है सबका यही अंजाम होना है

खिलौने तोड़कर बच्चे तभी तो खिलखिलाते हैं।

————————————————–सतीश कसेरा

Comments

3 responses to “थकी सोई हुई लहरों को चलकर थपथपाते हैं————————”

  1. Panna Avatar

    उन्हें मालूम है सबका यही अंजाम होना है
    खिलौने तोड़कर बच्चे तभी तो खिलखिलाते हैं।…. true…Bahut achi ghazal

    1. satish Kasera Avatar
      satish Kasera

      धन्यवाद पन्ना,
      इस शे’र का जो वास्तविक भाव था, वह आप तक पहुंचा। शुक्रिया

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

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