हर निभाने के दस्तूर क़र्ज़ है मुझ पे गोया रसीद पे किया कोई दस्तखत हूँ मैं राजेश'अरमान '

4 Comments

  1. बहुत खूब मित्र। ये दस्तखत ही दास्ताने–जिन्दगी है।
    आदमी आग हो हरदम , ये मुमकिन तो नहीं ।
    “रा…ख” के साये में ‘अं…गा…रे’ छुपे होते हैं ।।
    हर इक शख्स नहीं याद के काबिल “अनुपम” ।
    चन्द होते हैं : मसीहा , जो सलीब ढोते हैं ।।
    : अनुपम त्रिपाठी

Leave a Reply