दिलनशीं शाम के सवेरे

मानवीय अलंकार से सुसज्जित:-

दिलनशी शाम के सवेरे हैं
वायु में मद घुली हुई है
शहर का कोलाहल शांत
है देखो !
शबनम भी नहा रही है
चलो घूम लें थोड़ी देर छत पर
रूह की तरंगों से
आओ छू ले एक दूजे को
फटी हुई हृदय की शिराओं को
एक सूत्र में बांध लें आओ
तुम वहां से चांद को देखो
कुछ इस तरह से के मुझको भी नजर आओ!!!

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