दीये जलने दो जरा
कूछ उजाला हो जाए
वैसे तो अंधेरे की आदत है
आज कुछ अलग हो जाए
जिंदगी गुजरी है सीधी सी
आज रोकेट को कुछ टेडा कर के छोड देते है
शायद इससे किसी अंधेरे में उजाला हो जाए|
दीये जलने दो जरा
Comments
7 responses to “दीये जलने दो जरा”
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Niceeeeee…ji
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thanks pankaj
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अनुप्रिया जी, बहुत ही प्रशंसनीय , खासकर जिस प्रकार आपने विचार को एक मोड़ देकर छोड़ा बहुत अच्छा लगा |
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thanks vikas…I\’m happy that you liked my experiment with poetry
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वाह
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Good
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आज कुछ अलग हो जाए
जिंदगी गुजरी है सीधी सी
बहुत ही लाजबाब
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