मन !!जरा सी बात पर
तू मत दुखित हो इस तरह
जिन्दगी है हार भी है
जीत भी, संघर्ष भी।
गर कभी है अवनयन तो
है यहां उत्कर्ष भी।
डूबने का भय कभी है
तो कभी है नाव भी
है कभी ढलती पहाड़ी
और है चढ़ाव भी।
है कभी खुशियों की बारिश
है कभी दुःख की डगर
इन सभी को देखकर अब
मन मेरे तू दुख न कर।
सब लगा रहता है
दुख-सुख का निरंतर चक्र है
ईश खुश है तो कभी
उसकी नजर भी वक्र है।
राह में कंटक भले हों
हैं सजे कुछ फूल भी,
याद रख खुशियों की बातें
दर्द के पल भूल भी।
मन !!जरा सी बात पर
तू मत दुखित हो इस तरह
जिन्दगी है हार भी है
जीत भी, संघर्ष भी।
गर कभी है अवनयन तो
है यहां उत्कर्ष भी।
दुख-सुख का निरंतर चक्र है
Comments
4 responses to “दुख-सुख का निरंतर चक्र है”
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अतिसुंदर भाव
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बहुत खूब
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बहुत खूब
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ज़िन्दगी की समस्त सच्चाइयों को बयां करती हुई कवि सतीश जी की अति उत्कृष्ट रचना ।जीवन दर्शन करवाती हुई बहुत ही सुन्दर और सच्ची कविता “जिन्दगी है हार भी है जीत भी, संघर्ष भी।
गर कभी है अवनयन तो है यहां उत्कर्ष भी।”
वाह, लाजवाब अभिव्यक्ति अति उत्तम लेखन
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