“ धूप की नदी “

लड़की ; पड़ी है : पसरी
निगाहों के मरुस्थल में
………….धूप की नदी सी ।

लड़की का निर्वस्त्र शरीर
सोने—सा चमकता है
लोलुप निगाहों में
शूल—सा चुभता है ।

मगर , वह बे—खबर है
पसरी
पड़ी
है
धूप की नदी सी ………
निगाहों के मरुस्थल में ।
देह की रण—भूमि पर
विचारों के कुत्सित—शस्त्र
मर्यादा का ख़ून कर
गूँथ गए भूलकर
लड़की का बे—बस पिता
हाथ जोड़े तक रहा
: एक और जलती चिता ।

लड़की ; तनिक भी नहीं हिली ……शायद ! वह जानती है : अपनी नियति ।

उसे ; पता है ———–
निगाहों का मरुस्थल , उसका जीवन होगा !
और धूप की नदी : उसकी अभिन्न सखी !!

उसे ; पता है ———–
फैला
है
जिस्म
धूप बनकर धरती पर ।
कल ;
जब होंगे ….. उसकी देह पर खेत
हटाई जाएगी …… आसपास की रेत
वक्त : एक सवाल बनकर सम्मुख खड़ा होगा
“ शीशे की दीवार पर “ ; पारे—सा जड़ा होगा

निगाह : नदी बनकर बहेगी
नदी : समर्पण—कथा कहेगी
उसका हौंसला — उसकी उड़ान होगा
मुट्ठी में बिंधा ——– आसमान होगा
इतिहास के पृष्ठों से उभरकर ……….
भविष्य की जमीन पर बिखरकर……….
……………….. नई इबारत लिखी जाएगी
यही नदी : समंदर की पहचान कहलाएगी

जिस्म
का
जंगल
सुलगेगा
: बनेगा कुन्दन
धूप के मरुस्थल में ……………
………………. हवस दम तोड़ देगी

इसीलिए तो ; ——-
पसरी पड़ी है : लड़की
: निगाहों के मरुस्थल में
: धूप की नदी सरीखी ।
: अनुपम त्रिपाठी

Comments

5 responses to ““ धूप की नदी “”

  1. sagar sharma Avatar
    sagar sharma

    bahut ummda… srahniye..

    1. Anupam Tripathi Avatar
      Anupam Tripathi

      धन्यवाद सागरजी

  2. Rohan Sharma Avatar
    Rohan Sharma

    awesome piece of poetry 🙂

    1. Anupam Tripathi Avatar
      Anupam Tripathi

      आभार मित्र

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