धूप समेटकर अपने सुनहरी वसन,
चल पड़ी प्रीतम से करने मिलन
ओढ़ कर सितारों भरी काली चुनर
पलकों में सुनहरे ख्वाब सजाकर
कर के वादा कल फिर आने का जग से,
दुनियाँ को देने दीप्ति आकर
साॅंझ सखी से मिलकर जाती,
वादा निभाने धूप अगले दिन फिर है आती॥
_____✍गीता
धूप

Comments
2 responses to “धूप”
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साॅंझ सखी से मिलकर जाती,
वादा निभाने धूप अगले दिन फिर है आती।
बहुत खूब-
समीक्षा के लिए आपका बहुत सारा धन्यवाद सतीश जी
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