4 Comments

  1. कभी दिखता कभी छिप रहा है,
    नभ के उस तारे को,
    चाॅंद ढ़ूंढ़ रहा है।
    —- कवि गीता जी की बहुत सुंदर रचना। उत्तम भाव उत्तम शिल्प

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