ना जाने कब सुबह आएगी

किसी की आह में हम खोए हैं

ना जाने कब वो नज़र आएगी

एक रात की पनाह में सोये हैं

ना जाने कब सुबह आएगी

पूछो तो सासों के सुर बता सकता हूं

ना रूप, ना रंग, ना हाल बता सकता हूं

ना नाम, ना पता बता सकता हूं

मगर पूछो तो धडकन क़ी ताल बता सकता हूं

Comments

5 responses to “ना जाने कब सुबह आएगी”

  1. Panna Avatar

    Nice and different poetry

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. Satish Pandey

    Very nice

  4. Satish Pandey

    वाह

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