“ना तो इन्कार करते हैं ना ही इकरार करते हैं”

ना तो इन्कार करते हैं ना ही इकरार करते हैं,
मेरी हर अताओं को सरज़द स्वीकार करते हैं,

हया की तीरगी को वो नज़र से खा़क  करते हैं,
भरी महफिल में भी मुझसे निगाहें चार करते हैं,

मेरी हर अजाँओं को   निगाह-ए-पाक   करते हैं,
मेरे हर अल़म को भी   जलाकर   ऱाख करते हैं,

अहद-ए-हवादिश में भी तबस्सुम-जा़र करते हैं,
मेरी   हर  सदाओं   को सुपुर्द-ए-ख़ाक करते हैं,

कैद-खानें    में   ही      सही  मेरे    तिमसाल से,
वो      गुफ़्तगू        दो        चार      करते     हैं,

Comments

3 responses to ““ना तो इन्कार करते हैं ना ही इकरार करते हैं””

  1. Gaurav Singh Poet Avatar
    Gaurav Singh Poet

    Waah….

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