बच्चे दिए थे उसने
चार बच्चे,
रात को ठंड थी,
चूँ चूँ, कूँ कूँ
कर रही थी वह
एक बार भौंक भी दी दर्द में,
सामने के भवन में
सो रहे आदमी की
नींद में खलल पड़ गया,
उसे गुस्सा आ गया,
उसने पत्थर से उस माँ को
लहुलूहान कर दिया।
नींद में खलल
Comments
4 responses to “नींद में खलल”
-

वाह। दर्द भरी बातें कह दी आपने।
-

मार्मिक अभिव्यक्ति
-
दर्द भारी दास्तान कह गई ये पंक्तियां, कवि सतीश जी की कलम से दर्द बह गया
-
अतिसुंदर
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.