“नून” भोजपुरी कविता

“नून” भोजपुरी कविता

इक दिन बहुत हाहाकार मचल
भात ,दाल ,तरकारी में।
काहे भैया नून रूठल बा
बैठक भईल थारी में।

दाल- तरकारी गुहार लगईलक
नून के बैठ गोर थारी में
तरकारी कहलक सांस छूटता
दाल बा मरे के तैयारी में l

भात कहलक हे नाथों के नाथ
रऊआ बीना इ दुनूं अनाथ
रऊआ जे एकनी में मिल जइति
हमरो जीवन धन्य बनईति l

थरिया कहलक हम रहेम खाली -खाली
भात ,दाल, तरकारी जे ना हमरा के सम्भlली
बाज बाज के हम टूट जायेम
रऊआ जे ना एकनी के पाली l

फिर आगी सुन आईल भागल पडाईल
चुल्हा चौकी भी साथे लाईल
नून के लगे जा के
हाथ जोड़ रहे खड़ियाईल

आगी धईलक आपन बात
चुल्हा चौकी आऊर का हमर औकात
चीनी जे दे भी देता साथ
ना जलेम तबो हम दिन रात

फिर सब मिल , नून के बड़ाई कईलक
नून के खूब जयकार लगईलक
इ देख नून मस्त भईल
सब में मिल के ब्यस्थ भईल l

उदय शंकर “प्रसाद”
पूर्व सहायक प्रोफेसर (फ्रेंच विभाग),
हिंदुस्तान कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंस, तमिलनाडु

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