जिन्दगी की अंधेरी रातों में
काम जुगनू से न चल पायेगा,
कभी चमकता कभी बुझता सा
ये नहीं राह दिखा पायेगा।
दबा ले स्विच जगा ले बत्ती को
ये बत्ती हो मन की ऊर्जा की,
करे प्रकाश मन के भीतर में
पथ बाहर भी दिखा पायेगा।
बिना प्रकाश को जगाये मन
कहीं भटक न जाये राहों में
सत्य की भक्ति छोड़कर भोला
अटक न जाये अन्य चाहों में।
तोड़ने होंगे मोह तूलिका के
पतंगे पार निकलना होगा।
पतंगे पार निकलना होगा
Comments
One response to “पतंगे पार निकलना होगा”
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काम जुगनू से न चल पायेगा,
कभी चमकता कभी बुझता सा
ये नहीं राह दिखा पायेगा।
दबा ले स्विच जगा ले बत्ती को
ये बत्ती हो मन की ऊर्जा की,
____________ पाठक के मन में प्रेरणा और उत्साह जगाते हुए कवि सतीश जी की अति श्रेष्ठ रचना, लाजवाब अभिव्यक्ति एवम् उच्च स्तरीय लेखन
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