सुबह सुबह की
गरम चाय हो तुम
आलस्य छोड़ने में
सहाय हो तुम,
खुद ही बुनता रहा
उधेड़ रहा,
उलझी बातों में
मेरी राय हो तुम।
जिन्दगी को जरूरी
मुहब्बत हो तुम
दिल में राज करती
हुकूमत हो तुम।
कुछ कर सकने की
कूबत हो तुम,
पहली से भी पहली
जरूरत हो तुम।
पहली जरूरत हो तुम
Comments
3 responses to “पहली जरूरत हो तुम”
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बहुत खूब लिखा है सर
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बहुत ख़ूब, कविता चाय की सराहना के साथ साथ किसी और की भी सराहना कर गई और कवि सतीश जी चाय पर ही लिखते रह गए ।
सर्दियों में चाय की आवश्यकता को बताती हुई बहुत सुन्दर रचना -
अतिसुंदर भाव
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