अरी वो धूप
तुम क्यों डर गई ठंडक से
चीर कर आ जाओ
हमें तपा जाओ,
जीने की राह दिखा जाओ
कुहरे को दूर कर
आ जाओ।
अरी वो धूप
Comments
4 responses to “अरी वो धूप”
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वाह वाह, बहुत खूब, कवि ने अभिधा के साथ लक्ष्यार्थ साधना की है। भाषा मे सुन्दर प्रवाह है, कविता संप्रेषणीय है।
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बहुत सुंदर 👌👌
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कवि चंद्रा जी ने इतनी ठंड में धूप का आह्वाहन किया है, बहुत ख़ूब।
अतिश्योक्ति अलंकार का सुन्दर प्रयोग,
“अरी ओ धूप तुम क्यों डर गई ठंडक से चीर कर आ जाओ
हमें तपा जाओ,”
सुन्दर,शिल्प , ख़ूबसूरत कथ्य और सुन्दर लय साथ लिए हुए रोचक कविता -
बहुत खूब
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