पहाड़ों की ओर

आज तो यह सूरज
जैसे लाया एक नई भोर,
छोड़ के शहर का सारा शोर,
चली है यह बंजारन
उन पहाड़ों की ओर।

घुलना है इन महकती
हवाओं में,
उड़ना है परिंदों जैसे
इन फिज़ाओं में,
रहना है मुझे अब तो सिर्फ
इन पहाड़ों में।

कुछ इस तरह से घुल गई है
मुझ में यहाँ की हवा,
की अब यही मंज़िल मेरी
और यही है कारवां,
अब तो इन पहाड़ों में ही
जैसे जीना है सदा।

आसमान ने ही बांधी हो जैसे
मेरी इन पहाड़ों से कोई डोर,
जिससे खींचते है यह
मुझे हमेशा अपनी ओर।
तभी तो छोड़ के
शहर का यह सारा शोर,
आखिर में चली आई है
यह बंजारन,
इन पहाड़ों की ओर।

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