विषय– पिता की छांव
मां-पापा हैं मेरे जीवन की पतवार
कैसे चुका पाएंगे हम अपने पापा के उपकार
चलना सिखाया पापा ने
मुझे गोद उठा दिखलाया संसार
एक साया बनकर चलते संग
मुझे खुशियां देते अपार।
पापा से शुरू मेरा जीवन
लाते हैं खुशियों की बहार
कभी डांट न मिली मुझको
बस पाया प्यार स्नेह दुलार।
पापा के साये में पलता
मेरा संयुक्त परिवार
पापा की हर सीख हमें करे
हर चुनौती से लड़ने को तैयार।
हर ख्वाहिश पूरी करते
करते मेरा जग उजियार
नमन करूं मैं अपने पापा को
पापा की छांव में है जीवन गुलजार।
हर कदम पर साथ देते मेरे
पापा के दिये गये संस्कार
जब तक जिंदगी, करूंगी बंदगी
पापा आपको नमन वंदन बारंबार
स्वरचित एवं मौलिक रचना
—✍️ एकता गुप्ता “काव्या”
उन्नाव उत्तर प्रदेश
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