प्रिया (कविता)

रखे रहो हाथो पे हाथ प्रिया ,
सोचती रहो कोई अनसोंची बात प्रिया,
सर्द हवा के झोंके में,
जरा- ठहर जाओ रात प्रिया,
हम मिलजुल कर सुख दुःख बाटेंगे,
जो मिलेगा जन्म जात प्रिया।

Comments

5 responses to “प्रिया (कविता)”

  1. Shyam Kunvar Bharti

    वाह बहुत सुंदर भाव प्रिया

  2. अनुप्रास अलंकार का अच्छा प्रयोग

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