यदि कोई युवक-युवती
चाहें प्रेम विवाह करना
तो उनके और परिवार के
सुख की खातिर,
कभी मना नहीं करना
प्रेम-विवाह नहीं होगा तो
माता-पिता की मर्जी वाले विवाह में,
वह सुख महसूस नहीं होगा
स्मृति में रहेंगी बीती यादें
फ़िर वो घर महफूज़ नहीं होगा
प्रेम किसी से विवाह किसी से,
यदि ऐसा हो जाता है
ज़िन्दगी भर का यह नाता
उस मजबूती से ना जुड़ पाता है
जाति धर्म कुंडली सब छोड़ो,
दिल से दिल का नाता जोड़ो
फ़िर दिल ना टूटेंगे,
सुहागिनों के घर ना छूटेंगे
भारतीय समाज में व्यवस्था-विवाह
माना एक सिंहासन है,
पर प्रेम विवाह की करो व्यवस्था,
दो प्रेमियों को मिलाने का,
ये भी तो एक माध्यम है
यदि ऐसा ना हो तो..
निज साथी में फ़िर ढूंढे वही पुराना,
ना मिल पाए उस जैसा तो
आरंभ हो उनका कुम्हलाना
निज संतानों पर ऐसे ना प्रहार करो,
दिलवा दो दिल पसंद साथी
ऐसे तुम उनसे प्यार करो
युवाओं के माता-पिता से,
हाथ जोड़ विनती है मेरी
जबरदस्ती के बंधन में बांध के,
ना उनकी ज़िन्दगी का बुरा हाल करो,
उनकी मर्जी का देकर जीवनसाथी
उनकी ज़िन्दगी को खुशहाल करो
_____✍️गीता
प्रेम-विवाह
Comments
4 responses to “प्रेम-विवाह”
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बहुत खूब वाह, सुन्दर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी
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वाह वाह, अत्यंत खूबसूरत रचना
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सराहना हेतु सादर आभार कमला जी🙏
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