फिर मधुर सी गुनगुनाहट

कोई यहाँ आया नहीं
गीत भी गाया नहीं
फिर मधुर सी गुनगुनाहट
कान में कैसे बजी।
क्या पवन संदेश लाई
भूतकालिक प्रेम का
या किसी शैतान भँवरे की
है यह मुझ पर ठिठोली।
पर लगा ऐसा कि जिसके
तार थे दिल से जुड़े,
आज उसके शब्द कैसे
कान में आकर पड़े।
बूंद सी थी वह मुहब्बत
खो गई थी जग-उदधि में
वक्त बीता, हम भी संभले
घिस गये थे शूल गम के।
आज फिर से याद करने
को किया मजबूर है,
खो गया बीता हुआ कल
जो गया चिर दूर है।

Comments

8 responses to “फिर मधुर सी गुनगुनाहट”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत सुंदर कल्पना

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

  3. उच्चकोटि की शानदार प्रस्तुति

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत आभार

  4. Virendra sen Avatar

    खूबसूरत रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

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