बचपन जल रहा है

बचपन जल रहा है,
जल उसे बुझा न सकेगा,
जल रहा है बड़ों की इच्छाओं के तले,
उनकी आशाओं के तले,
चाहते हैं पूरे हो सब ख्वाब,
पर कभी पूछते नहीं उनसे,
बांधकर एक सीमित दायरे में,
कैसे बचपन पल रहा है,
जहां टिमटिमाती आंखों में,
खेलकूद के सपने कम,
और जिम्मेदारियों का बोझ,
ज्यादा पड़ रहा है,
बचपन जल रहा है।

Comments

12 responses to “बचपन जल रहा है”

  1. Geeta kumari

    कुछ अभिभावक करते हैं ऐसा, लेकिन बच्चों पर अपनी महतत्वाकांक्षाओं का बोझ नहीं डालना चाहिए। उनकी इच्छाओं का सम्मान रखते हुए सही मार्गदर्शन करना चाहिए।……
    ………. बहुत सुंदर रचना

  2. Pratima chaudhary

    सुन्दर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद मैम जी

  3. अतिसुंदर भाव अतिसुंदर रचना

    1. बहुत बहुत धन्यवाद सर

  4. Rishi Kumar

    कोई किताबों से दब रहा है,
    कोई बेसहारों से मर रहा है,
    छूट गए आज बचपन उनके,
    बचपन से ही जो हॉस्टल में रह रहा है

    नौकरी का दबाव मिल रहा है,
    बचपन से ही वह सपने जला रहा है,

    आपकी बहुत ही अच्छी कविता

    1. बहुत बहुत आभार सर

  5. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    Dil ko chu liya

    1. धन्यवाद सर

  6. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बहुत सुंदर पंक्तियां

  7. Pratima chaudhary

    Thank you

  8. Deep

    अनोखा

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