बचपन
कहीं से कहीं तलक कोई और नज़र आता नहीं,
बचपन में खेल के सिवाये कोई और भाता नहीं,
कहाँ से शुरू और कहाँ पर खत्म हो जाते हैं लम्हें,
ढूंढने निकलो तो कोई ओर छोर नज़र आता नहीं,
उड़ती हुई पतंग जब हत्थों से कभी कट जाती है,
चरखी में फिर डोर में कोई जोर नज़र आता नहीं।।
राही अंजाना
Very true
धन्यवाद
Nice one
धन्यवाद
Waah
धन्यवाद
वाह
धन्यवाद
Nice
Thank
वाह बहुत सुंदर रचना ढेरों शुभकामनाएं
Nice one
Superb
Good