बच्ची बन कर

मन करता है सपने जो देखूं,
मैं सच में उनसे मिल जाऊं,

मन करता है पढ़ लिखकर मैं अपने,
माँ पापा से आगे बढ़ जाऊँ,

मन करता है डर को जीतूँ,
इस दुनियाँ से मैं लड़ जाऊं,

मन करता है चलना सीखूं,
और पर्वत पे मै चढ़ जाऊं

मन करता है बारिश बनकर,
इस धरती से मैं जुड़ जाऊं,

मन करता है सोने को अपनी,
माँ के आँचल में छुप जाऊं,

मन करता है पंछी बनकर,
मैं दूर गगन में उड़ जाऊं,

मन करता है बच्ची बनकर,
फिर बचपन में मुड़ जाऊं।।

राही (अंजाना)

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